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 उपलब्धियां (2014-20)
आईपीएम मॉड्यूल का संश्लेषण और सत्यापन
धान

धान आधारित फसल प्रणाली में स्थान विशिष्ट आईपीएम मॉड्यूल का वैधीकरण और संवर्धन

  •   बासमती धान मे आईपीएम मॉड्यूल को 2010-13 के दौरान 40 हेक्टेयर क्षेत्र में ग्राम बम्बावाड, गौतम बुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश में मान्य किया गया था। जिला गौतमबुद्धनगर, यूपी में ग्राम बम्बावाड के आसपास बासमती धान (पूसा बासमती 1121) में मान्य आईपीएम मॉड्यूल को बढ़ावा देने के लिए किसान खेत पाठशाला (एफएफएस) के माध्यम से किसानों को संगठित करने का प्रयास किया गया; जिसके परिणामस्वरूप 654 किसानों की भागीदारी से 42 गांवों के क्लस्टर में 990.40 हेक्टेयर में इसका क्षैतिज प्रसार हुआ। किसानों के स्व-अभ्यास वाले खेतो की तुलना में प्रमुख कीटों की घटना/संख्या [पीला तना बेधक (वाईएसबी), पत्ती ल्पेटक (एलएफ) और ब्राउन प्लांट हॉपर (बीपीएच)] और बीमारियाँ [म्यान ब्लाइट, बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट (बीएलबी) और बाकाने] आईपीएम वाले खेतो में काफी कम रही; आईपीएम के अभ्यासो ने प्राकृतिक शत्रुओ, विशेष रूप से मकड़ियों के संरक्षण के लिए प्रेरित किया, एफपी में 1.76 वयस्क/समहू की तुलना में आईपीएम मे मकड़ियों की संख्या 3.39 वयस्क/समहू दर्ज की गयी। आईपीएम में रसायनो के छिड़काव कम हुए जोकी 0.2 छिडकाव (सक्रिय घटक 28.2 ग्रा./हे.) के मुकाबले एफपी मे रसायनो के छिडकाव की संख्या 2 छिडकाव (सक्रिय घटक 79.87ग्रा./हे.) रही।
  • लक्सर, हरिद्वार, उत्तराखंड में 60 हेक्टेयर में बासमती धान में आईपीएम मॉड्यूल को संश्लेषित और मान्य किया गया। लक्सर में, रासायनिक छिडकाव को एफपी में 5.8 छिडकाव (सक्रिय घटक 1870 ग्रा./हे.) की तुलना में आईपीएम मे 2.0 छिड़काव (सक्रिय घटक 347.5 ग्रा./हे.) तक कम किया गया।
  • आईपीएम मॉड्यूल के ऑन-फ़ार्म सत्यापन और प्रदर्शन को अर्ध-गहरे पानी के धान के लिये (वर्षाध्न किस्म) और उची भूमि वाला धान 20 हेक्टेयर और 40 हेक्टेयर जो की क्रमशः संतोषपुर, बालासोर, ओडिशा और हरेम हजारीबाग, झारखंड में किया गया।
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बासमती धान के लिए आईपीएम मॉड्यूल का किसान सहभागी मोड में बड़े पैमाने पर कार्यान्वयन
  • संस्थान द्वारा विकसित आईपीएम मॉड्यूल मैसर्स टिल्डा हैन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के साथ एक परामर्श परियोजना के तहत किसानों के सहभागी मोड में बासमती धान में बड़े पैमाने पर लागू किया गया।
  • खरीफ 2019 के दौरान 396 गांवों में 2462 किसानों की भागीदारी से हरियाणा के जींद, कैथल, कुरुक्षेत्र, यमुनानगर और पानीपत जिलों में बासमती धान (पूसा बासमती -1) के 15,623 हेक्टेयर में आईपीएम मॉड्यूल लागू किया गया।

    हरियाणा, पंजाब, यूपी और उत्तराखंड में आईपीएम कवरेज: 18000 हेक्टेयर (लगभग)

कपास

किन्नू के बढ़ते हुए कपास आधारित फसल प्रणाली क्षेत्र में आईपीएम का सत्यापन और प्रोन्नति 

  • किसानों की भागीदारी से वर्ष 2019 के दौरान नॉर्थ ज़ोन में सफ़ेद मक्खी के हॉट स्पॉट में लगभग 120 हेक्टेयर क्षेत्र में कपास आईपीएम प्रौद्योगिकी को वेलीडेट किया गया।
  • आईपीएम प्रौद्योगिकी के कार्यान्वयन से कीटनाशको के प्रयोग में कमी हुई। कीटनाशक के अनुप्रयोगों में, सक्रिय संघटक 87.37% और कीटनाशक किसान प्रथा की तुलना में आईपीएम में 43.58% की लागत आई। आईपीएम के कार्यान्वयन के परिणामस्वरूप उपज में 43.88% की वृद्धि और शुद्ध लाभ में 99.92% तक वृद्धि हुई।
  • आईपीएम के कार्यान्वयन से प्राकृतिक दुश्मनों (परभक्षी) की आबादी में किसान प्रथा की तुलना में 276% (आईपीएम में 0.79/पौधा और किसान प्रथा में 0.21/पौधा) वृद्धि हुई।
  • नियमित अंतराल पर किसान स्कूलों का आयोजन कर आईपीएम किसानों को कीट और प्राकृतिक दुश्मनों की पहचान, निगरानी, ईटीएल व कीटनाशकों का विवेकपूर्ण उपयोग पर प्रशिक्षण दिया गया।
  • साप्ताहिक अंतराल पर पोटेशियम नाइट्रेट (एनपीके 13.0.45 @ 2%) का पर्ण उपयोग कर ClCuD प्रभावित कपास के खेतों का सफलतापूर्वक प्रबंधन किया तथा कपास की सामान्य बीज उपज प्राप्त की।

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फाज़िल्का में सफ़ेद मक्खी के हॉट स्पॉट में कपास में आईपीएम कार्यनीति का सत्यापन

  • वर्ष 2016-17 के दौरान सफ़ेद मक्खी के हॉटस्पॉट पंजाब के गाँव निहालखेरा, फ़ाज़िल्का में लगभग 3 हेक्टेयर क्षेत्र में किसानों की भागीदारी से कपास आईपीएम कार्यनीति का स्त्यापन किया गया।
  • कपास में आईपीएम कार्यान्वयन से कीटनाशकों के उपयोग में महत्वपूर्ण कमी (> 80%) जोकि आईपीएम में 3 छिडकाव (1.2 किग्रा एआई/हे.) तथा किसान प्रथा में 13 छिडकाव (10.61 किग्रा एआई/हे.); इनपुट की लागत आईपीएम में रू 77,700.60/हे. तथा एफपी में रू 1,07,241.40/हे. थी। आईपीएम से प्राकृतिक दुश्मनों का संरक्षण भी हुआ।

गुलाबी बॉलवर्म पर ज़ोर देते हुए कपास में आईपीएम की मान्यता और प्रोन्नति

  • खरीफ 2018 के दौरान गुलाबी बॉलवर्म के हॉटस्पॉट मध्य क्षेत्र के जालना जिले के वखारी गाँव में लगभग 25 हे. क्षेत्र में किसानों की भागीदारी से बीटी कपास में आईपीएम तकनीक का सत्यापन किया जोकि खरीफ 2019 में 30 हे. क्षेत्र में जारी रहा।
  • समेकित कीट प्रबंधन रणनीतियों के प्रसार के लिए फसल के मौसम के दौरान गांव वखारी और केवीके जालना में 15-30 दिनों के अंतराल पर एफएफएस और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए।

कपास में उभरते कीटों के लिए आईपीएम कार्यनीति का संश्लेषण और सत्यापन

  • कपास में किसानों भागीदारी रीति से आईपीएम प्रौद्योगिकी का सत्यापन जिसके लिए दक्षिणी क्षेत्र में मिरिड बग के लिए 30 हे. से अधिक क्षेत्र और उत्तरी क्षेत्र में रस चूसने वाले कीटों के लिए 40 हे॰ से अधिक क्षेत्र का चयन किया गया।
  • नियमित अंतराल पर किसान स्कूलों का आयोजन कर आईपीएम किसानों को कीट और प्राकृतिक दुश्मनों की पहचान, निगरानी, ईटीएल व कीटनाशकों का विवेकपूर्ण उपयोग पर प्रशिक्षण दिया गया।
  • आईपीएम तकनीक को लोकप्रिय बनाने के लिए, जींद जिले के विभिन्न गांवों में कपास दिवस का आयोजन करके कीटों और प्राकृतिक शत्रुओ की पहचान, क्षति की प्रकृति और आईपीएम घटकों के प्रयोग के बारे में किसानों (200 से अधिक) के कौशल को विकसित करने के लिए जागरूकता पैदा की गई।

दलहन

एनएफएसएम के तहत त्वरित दलहन उत्पादन कार्यक्रम (ए3पी)  

  • एनएफएसएम के अंतर्गत छह राज्यों के 16443.62 हे. क्षेत्र में प्रमुख दलहनी फसलों अरहर, चना, मूंग, उड़द और मसूर में आईपीएम कार्यक्रम को कार्यान्वित किया गया। इस प्रोग्राम के अंतर्गत, विभिन्न आईपीएम कार्यनीतियों की प्रभावशीलता को प्रमाणित व प्रदर्शित करने के लिए 173 नुक्लियर आईपीएम गांव विकसित किए गए।
  • आईपीएम कार्यान्वयन में 9775.12 हे., महाराष्ट्र में 2584.4 हे., मध्य प्रदेश में 300 हे., आंध्र प्रदेश में 800 हे., उत्तर प्रदेश में 2571 हे. और झारखंड में 1000 हे. को कवर किया गया तथा इससे 11098 किसान लाभार्थी रहे, जो कि मूंगफली, चना, मूंग और उरद दाल उगा रहे हैं।
  • किसानों को अनाज की पैदावार और गुणवत्ता बढ़ाने में सूक्ष्म पोषक तत्वों, जैव-उर्वरकों, जैव-कवकनाशकों और सिंथेटिक उर्वरकों के महत्व का अनुभव करने का अवसर मिला। उन्नत किस्मों के उपयोग से कीट प्रकोप को कम करने और बीमारी की घटनाओं में सुधार करने में मदद मिली जिस कारण उपज में 25-40% की वृद्धि हुई।
  • दलहन उत्पादकों की नेटवर्किंग के माध्यम से केंद्रीकृत राष्ट्रीय कीट रिपोर्टिंग और अलर्ट सिस्टम स्थापित किया ताकि उनके क्षेत्रों में कीट स्थिति के आधार पर उन्हें समय पर सही कीट प्रबंधन सलाह प्रदान की जा सके। इससे उन्हें छिडकाव की संख्या और पौधों की सुरक्षा की लागत को कम करने में मदद मिली।
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तिलहनी फसलें

मूंगफली की फसल में स्थान विशिष्ट व पर्यावरण-अनुकूल आईपीएम प्रौद्योगिकी का संश्लेषण और सत्यापन 

  • किसान भागीदारी रीति से जूनागढ़, गुजरात और अनंतपुर, आंध्र प्रदेश में मूंगफली की फसल में स्थान विशिष्ट व पर्यावरण-अनुकूल आईपीएम प्रौद्योगिकी का सत्यापन किया गया।
  • आंध्र प्रदेश के अनंतपुर में मूंगफली की पैदावार किसान प्रथा में 8.63 क्विंटल/हे. की तुलना में आईपीएम में 9.09 क्विंटल/हे. थी।

भारतीय सरसों में प्राथमिकता वाले घटक-वार एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन पैकेज का विकास और सत्यापन (2014-2017) 

  • सरसों की फसल में माइक्रोबियल, वनस्पति और रासायनिक कीटनाशक युक्त आईपीएम पैकेज का तीन फसल के मौसमों (2014-17) के दौरान, तीन स्थानों (राजपुर खुर्द, नई दिल्ली, आईएआरआई, नई दिल्ली और आरएआरआई, दुर्गापुरा, जयपुर) पर फसल तनावों के शमन और बीज की पैदावार और आर्थिक लाभ के सटीक आकलन के लिए मूल्यांकन किया गया।
  • ट्राइकोडर्मा के द्वारा मृदा आवर्धन व बीजोपचार तथा थियामेथोक्साम का छिडकाव को एफिड्स और वाइट रस्ट की बीमारी को कम करने और उपज बढ़ाने में अनट्रीटिड् कंट्रोल से बेहतर पाया गया।
  • सरसों के लिए घटक-वार आईपीएम पैकेज का सत्यापन में, लहसुन के अर्क से बीज उपचार (2% w/v) रिटर्न के मामले में सबसे व्यवहार्य तकनीक साबित हुई।
  • सरसों में आईपीएम प्रौद्योगिकी को अपनाने में निवेश किए गए प्रत्येक अतिरिक्त रुपये ने बदले में 5.1 रु. दिये जिस कारण इस तकनीक को अपनाने के लिए एक अच्छा आर्थिक तर्क मिला।
  • रबी, 2017-18 की ज़ेडआरईएसी बैठक के दौरान एसडीए, राजस्थान के द्वारा राजस्थान के जोन IIIa (जयपुर, अजमेर, टोंक और दौसा) के लिए सरसों में आईपीएम को पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेस में शामिल किया गया और अब इसे उपयोगकर्ताओं द्वारा व्यापक रूप से अपनाया जा रहा हैं।
  • मोहिंदरगढ़ (हरियाणा) और अलवर (राजस्थान) जिले में आईपीएम पैकेज का फसल वृद्धि चरण के साथ 60 हे. में बड़े पैमाने पर वर्ष 2014-17 के दौरान सत्यापन किया गया।

सरसों आधारित फसल प्रणाली में आईपीएम प्रौद्योगिकी का कार्यान्वयन  

  • सरसों में आईपीएम के संश्लेषण और सत्यापन के लिए आरआरएस, बावल, रेवाड़ी, हरियाणा और केवीके, नवगांव, अलवर, राजस्थान में वर्ष 2017-19 के दौरान प्रयोग किए गए।
  • वर्ष 2018-19 के दौरान कबलाना गांव, झज्जर और मोहम्मदपुर, अलवर में 20 हे. क्षेत्र में किसान भागीदारी रीति से सरसों में सत्यापित आईपीएम का बड़े पैमाने कार्यान्वयन किया गया। प्रमुख नाशीजीव ब्रूमरेप, स्क्लेरोटिनिया रॉट, वाइट रस्ट, सरसों एफिड, पेंटेड बग और अल्टरनेरिया ब्लाइट थे। सरसों की आईपीएम प्रोद्योगिकी ने किसान प्रथा से बेहतर प्रदर्शन किया।

बागवानी की फसलें

बागवानी फसलों में टिकाऊ और अनुकूलनीय आईपीएम प्रौद्योगिकी का सत्यापन और प्रोन्नति

करेला

  • महागांव व बसारतपुर गांव, करनाल, हरियाणा में 40 हे. से अधिक व वाराणसी, उत्तर प्रदेश में 12 हेक्टेयर क्षेत्र में करेला में आईपीएम मॉड्यूल का सत्यापन किया गया।
  • कर्नल में किसान प्रथा में 8.5 रासायनिक छिडकाव की संख्या की तुलना में आईपीएम में 5.5 रासायनिक छिडकाव की संख्या थी तथा आईपीएम में उपज में 187.4 क्विंटल/हे. की वृद्धि हुई जबकि वाराणशी में रासायनिक छिडकाव की संख्या घट कर 7 हो गई और उपज में 187 क्विंटल/हे. की वृद्धि हुई।

खीरा

  • करनाल, हरियाणा के 40 हे. क्षेत्र में खीरे की फसल के लिए आईपीएम तकनीक का विकास व सत्यापन किया गया। रासायनिक छिडकाव की संख्या आईपीएम में 5.0 जेजबकि किसान प्रथा में 12.0 रही तथा फसल की उपज आईपीएम में 252.8 क्विंटल/हे. की तलना में किसान प्रथा में 244.0 क्विंटल/हे. हुई। खीरे में डाउनी मिल्ड्यू के प्रबंधन मेंसाइमोक्सलीन 8% + मैनकोजेब 64% (कर्जेट 72 डब्लूपी) प्रभावी रहा।

लौकी

  • करनाल जिले (हरियाणा) में 60 हे. क्षेत्र में लौकी की फसल के लिए आईपीएम तकनीक का सफलतापूर्वक प्रदर्शन किया गया। आईपीएम तकनीक के कार्यान्वयन से किसानों के खेतों में 220.45 क्विंटल/हे. की तुलना में लौकी की पैदावार 352.16 क्विंटल/हे। तक बढ़ गई। लौकी में आईपीएम लागत-लाभ अनुपात 1:3.87 किसान प्रथा में 1: 2.40 की तुलना में अधिक था। स्टीकर के साथ नीम तेल 0.15% (1500 पीपीएम) का उपयोग करके लाल कद्दू के बीटल को बहुत अच्छी तरह से प्रबंधित किया गया।

प्याज

  • महाराष्ट्र के पुणे में रबी में वडगाँव सहनी और खरीफ में खैरवाड गाँव में प्याज की फसल के लिए आईपीएम तकनीक को 10 हे. क्षेत्र में सत्यापित किया गया। प्याज की आईपीएम तकनीक को करनाल जिले के सिंगोहा-रंभा गाँव में भी सत्यापित किया गया।
  • आईपीएम के कार्यान्वयन से रबी और खरीफ के दौरान आईपीएम में 1:1.9 के उच्चतर सीबीआर के साथ रासायनिक कीटनाशक छिडकाव में कमी जो कि 10.0 से घटकर 3.0 हो गई। आईपीएम प्रौद्योगिकी के कार्यान्वयन से उपज में मामूली वृद्धि हुई।
  • जैविक प्याज (गैर-रासायनिक) बढ़ने से हरियाणा के करनाल में प्याज की पैदावार कम हुई।

शिमला मिर्च

  • हरियाणा के करनाल में 54 हे. क्षेत्र में शिमला मिर्च में आईपीएम का प्रदर्शन किया गया। आईपीएम के कार्यान्वयन से किसान प्रथा में 113.1 क्विंटल/हे. उपज की तुलना में आईपीएम में 362 क्विंटल/हे. की वृद्धि हुई। लागत-लाभ अनुपात किसान प्रथा में 1:2.12 की तुलना में आईपीएम में असाधारण रूप से उच्च 1:4.63 था।

संतरे के बागों के लिए आईपीएम रणनीतियों का विकास और सत्यापन  

  • जैवकीटनाशकों और कम जोखिम वाले कीटनाशकों पर आधारित आईपीएम मॉड्यूल; कीटों की स्काउटिंग और निगरानी; कीट प्रबंधन की बेहतर सस्य क्रियाएँ और यांत्रिक तरीकों का पंजकोसी गांव, फाजिलिका, पंजाब और सिटृस रिसर्च स्टेशन, तिनसुकिया, असम में सत्यापन किया गया।
  • आईपीएम के कार्यान्वयन से फाजिल्का, पंजाब में फल की पैदावार 272 क्विंटल/हे. और असम के तिनसुकिया में 131.8 किग्रा/वृक्ष बढ़ गयी।

    फ़ाइटोफ्थोरा, ग्रीनिंग रोग और रस चूसने वाले कीटों के प्रबंधन पर मुख्यत: ध्यान केंद्रित किया गया था।
संरक्षित खेती और जैव नियंत्रण
नेटवर्क अपप्रोच द्वारा संरक्षित खेती के लिए मल्टी-लोकेशन आईपीएम प्रौद्योगिकी का सत्यापन 
  • आईपीएम के कार्यान्वयन से टमाटर, खीरा और शिमला मिर्च की वजन, पैदावार और गुणवत्ता में वृद्धि हुई।
  • पॉली-हाउस के अंदर सफ़ेद मक्खी, चेपा और मिलीबग का संक्रमण कम पाया गया।
  • चूसने वाले कीटों के प्रबंधन के लिए वर्टिसिलियम लेकेनी का साप्ताहिक उपचार काफी प्रभावी रहा।
  • फाइटोप्थेरा का माइनर संक्रमण दर्ज किया गया, जिसका सिंचाई के साथ टी. हर्जियानम का वेंचुरी द्वारा मृदा उपचार करके प्रबंधन किया गया।
  • मृदा जनित रोगों के प्रबंधन के लिए कार्बेन्डाजिम (50% डब्लू.पी.) को पूरक बनाया गया।
  • गर्मी के महीनों (मई-जून) में 25 माइक्रोन पॉलीइथाइलीन पारदर्शी चादर के साथ मिट्टी का सोलराइजेशन, इसके बाद 800 किलोग्राम/4000 एम2 नीम केक जैव-एजेंटों (स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस और ट्राइकोडर्मा हार्ज़िनम) फोरटिफाइड को खेत में डालने के बाद 100% रूट-नॉट नेमाटोड (मेलोइडोगाइन इनकोगनिटा) को कम कर दिया।
  • टमाटर और शिमला मिर्च की अच्छी विपणन योग्य उपज (औसत बिक्री योग्य फलों का वजन 300 ग्राम) प्राप्त किया गया; बड़े आकार के फल के साथ औसतन टमाटर की उपज 9.5 किग्रा/पौधा व और शिमला मिर्च की 3.6 किग्रा/पौधा थी, जबकि खुले खेतों में छोटे फलों के आकार के साथ टमाटर की उपज 3.3 किग्रा/पौधा व 1.6 शिमला मिर्च की 1.6 किग्रा/पौधा थी। खीरा की औसत उपज 4.2 किग्रा/पौधा दर्ज की गई।
  • पॉली हाउस के तहत आईपीएम के कार्यान्वयन ने रंगीन शिमला मिर्च में बढ़े हुए लागत-लाभ अनुपात 1:3.46 के साथ कीटनाशकों के उपयोग को 70% तक कम कर दिया।

उन्नत आईपीएम उपकरण और तकनीकों का विकास और प्रोन्नति

  • कीटों के प्रबंधन के लिए आईपीएम गैजेट्स जैसेकी कीट लाइट ट्रप को और परिष्कृत व मानकीकृत किया गया।
  • संशोधित कीट प्रकाश जाल का किसान भागीदारी रीति से धान, गन्ना, आम, बेर, टमाटर, चीकू, ज्वार की फसल में विभिन्न जगहों पर प्रदर्शन किया गया।
  • आईसीएआर-एनसीआईपीएम को आईपीएम गैजेट्स के लिए पांच पेटेंट (तीन राष्ट्रीय और दो अंतर्राष्ट्रीय) दिए गए हैं।

 light trap

जैव-कीटनाशकों का ऑन-फार्म बड़े पैमाने पर उत्पादन हेतु प्रौद्योगिकियों का विकास और प्रोन्नति

  • टी. हर्जियानम के लिए एक विशिष्ट और चयनात्मक माध्यम विकसित किया गया।
  • बेसिलस सबटिलिस, बैसिलस थुरिंगिएन्सिस, स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस, एज़ोटोबैक्टर स्पीशीज, राइजोबियम स्पीशीज और एज़ोस्पिरिलम स्पीशीज जैसे विभिन्न जीवाणुओं के द्रव्यमान गुणन के लिए अनाज (आटा) आधारित माध्यम विकसित किया गया।
  • ट्राइकोडर्मा स्पीशीज के तरल पदार्थ का छोटे शीशी के रूप में निर्माण किया व बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए मातृ कल्चर प्रदान करने हेतु विभिन्न जीवाडुओं को विकसित किया गया।
  • विभिन्न सूक्ष्म जीवों के उच्च घनत्व (2.0 x 10 ^ 12) सीएफयु. के बीओजेल विकसित किए गए।
  • छोटे शीशी में टी. हर्ज़ियानम का शेल्फ जीवन 11 महीने तक दर्ज किया गया जो कि 2 x 10 ^ 9 था।
  • चौबीस एफएफएस का आयोजन "माइक्रोबियल जैव-एजेंटों के खेत में बड़े पैमाने पर उत्पादन" की प्रक्रिया का प्रदर्शन करने के लिए किया गया और इस प्रकार 46 किसान हमारी तकनीक का उपयोग करके बड़े पैमाने पर जैव-एजेंटों का उत्पादन करने में सक्षम बने। किसानों और गैर सरकारी संगठनों के कार्यकर्ताओं के बीच लगभग 1300 छोटी शीशी वितरित की गयी।
डाटाबेस और इलेक्ट्रॉनिक नेटवर्किंग
फसल नशीजीव निगरानी और सलाहकार परियोजना (क्रॉपसैप) – महाराष्ट्र

  • राज्य के कृषि विभाग के सहयोग से महाराष्ट्र में की लक्षित फसलों के 110 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में मोबाइल आधारित एमक्रॉपसैप परियोजना का कार्यान्वयन लगातार किया गया।
  • जरूरत (आर्थिक सीमा स्तर- ईटीएल) आधारित कीट प्रबंधन परामर्श प्रत्येक लक्षित फसल के लिए तैयार किए गए और पंजीकृत किसानों को प्रत्येक सीजन में एसएमएस के माध्यम से विस्तृत और संक्षिप्त स्वरूपों में महाराष्ट्र के एसएयूज के साथ मिलकर एडवाईजरी के रूप में भेजा गया।
  • 2018 के बाद से आक्रामक कीट पतन आर्मीवॉर्म (एफएडब्लू) (सपोडोपटेरा फ्रुगीपरडा) के लिए निगरानी और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। खरीफ मक्का के 8.84 लाख हेक्टेयर में से एक में एफएडब्ल्यू संक्रमण था और 2019 में लेबल कलेम कीटनाशकों का उपयोग करके 99% संक्रमित क्षेत्रों का समय पर इलाज किया गया।
  • कीटनाशक-कवकनाशी गणना के वेब और मोबाइल ऐप अंग्रेजी और मराठी में लक्षित फसलों (चावल, सोयाबीन, कपास, चावल, कबूतर, मक्का, गन्ना और शर्बत) के लिए विकसित और जारी किए गए।
  • द्विभाषी (अंग्रेजी और मराठी) मक्का कीटनाशक कैलकुलेटर जोकि खेत के लिए सिफारिश की गयी व पानी से पतलापैन की खुराक व प्रयोग विधि अनुसार आवश्यक कीटनाशक/कवकनाशी/शाकनाशी मात्रा की गणना करने में मदद करने के लिए विकसित किया गया और इसे गूगल प्ले स्टोर पर होस्ट किया गया।

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बागवानी फसल कीट निगरानी और सलाहकार परियोजना (होर्टसैप) –महाराष्ट्र

  • परियोजना की आवश्यकताओं के अनुसार, विकसित वेब आधारित कीट निगरानी और सलाहकार प्रणाली को परियोजना के अंतर्गत और विकसित किया गया। वर्ष 2019-20 के दौरान आई.सी.टी आधारित कीट निगरानी को 23 जिलों तक बढ़ा दिया गया, जिसमें छह फसलों अनार, केला, नागपुर मंडारिन, मीठा संतरा, सपोटा और आम का 3, 15,104 हेक्टेयर क्षेत्र शामिल है।
  • आईपीएम रणनीतियों के कार्यान्वयन को एसएयूज, आईसीएआर संस्थानों और राज्य बागवानी विभाग, महाराष्ट्र के सहयोग से प्रणाली के माध्यम से सुगम बनाया गया।
  • समय पर आईपीएम विकलपों के उपयोग हेतु जनवरी 2019 से मई 2019 के बीच किसानों को 2146 कीट प्रबंधन सलाह व दिसंबर 2019 में 550 सलाह जारी की गई।

हरियाणा में चयनित बागवानी फसलों के लिए आई.सी.टी. आधारित कीट निगरानी और सलाहकार सेवाएं

  • हरियाणा में चयनित बागवानी फसलों के टमाटर, कुकुरबिट्स, क्रूसेफर्स और किन्नो के लिए मोबाइल आधारित नशीजीव निगरानी और सलाहकार प्रणाली को डिजाइन और विकसित किया गया। सिस्टम में कीट डेटा कैप्चर हेतु मोबाइल ऐप और कीट रिपोर्टिंग और सलाह हेतु वेब आधारित ऐप सम्मलित हैं।
  • वर्ष 2018-19 के दौरान हरियाणा के करनाल, कुरुक्षेत्र, पानीपत, सोनीपत, गुरुग्राम, मेवात, फतेहाबाद और हिसार जिलों से संबंधित 9375 हेक्टेयर क्षेत्र में प्रणाली को सफलतापूर्वक लागू किया गया।
  • परियोजना कर्मचारियों के लिए एचटीआई, उचनी, करनाल में नशीजीव की पहचान, रिकॉर्डिंग, अवलोकन और सिस्टम संचालन के विभिन्न पहलुओं पर दो प्रशिक्षण आयोजित किए गए।
  • वर्ष 2019 के दौरान सिस्टम में 15,841 नशीजीव डेटा प्रविष्टियां दर्ज की गईं. वर्ष के दौरान कीट प्रबंधन सलाह प्राप्त करने के लिए कुल 5778 किसानों को सिस्टम में पंजीकृत किया गया। पंजीकृत किसानों को उनके मोबाइल फोन पर 1,374 ईटीएल आधारित नशीजीव प्रबंधन सलाह 2, 05,170 एसएमएस के माध्यम से भेजी गईं।
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बैंगन और टमाटर के लिए मोबाइल आधारित कीट प्रबंधन सूचना प्रणाली का विकास: पीएमआईएस 2.0

  • बैंगन और टमाटर की फसलों में कीट प्रबंधन के लिए एंड्रॉइड आधारित मोबाइल ऐप (पीएमआईएस 2.0) हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं में विकसित किए गए।
  • ऐप किसानों और विस्तार श्रमिकों को बैंगन और टमाटर फसल में कीट प्रबंधन के लिए समय पर सही जानकारी प्रदान करते हैं व गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध हैं।
mobile apps
नाशीजीव पूर्वानुमान और चेतावनी
जलवायु परिवर्तन के संबंध में कीट की ड्यनामिक्स
  • 10 कृषि जलवायु क्षेत्रों के 12 कृषि पारिस्थितिक क्षेत्रों से 11 राज्यों में 24 स्थानों पर चार फसलों के लिए चावल (7), कबूतर (6), मूंगफली (5) और टमाटर (6), आईसीटी आधारित रियल टाइम पेस्ट डायनेमिक्स (आरटीपीडी) के अध्ययन प्रोग्राम को वर्ष 2011 से 2016 तक कार्यान्वित किया गया गया तथा इसे 2020 तक आठ स्थानों के लिए जारी रखा गया।
  • जलवायु और कीट परिदृश्य पर बहु स्थान-बहु मौसम डेटाबेस क्रमशः खरीफ और रबी के संबंध में 24 स्थानों, 23 और 15 के लिए विकसित किया गया।
  • वार्षिक और मौसमी अवधियों के लिए जलवायु परिवर्तनशीलता के रुझान उनके परिमाण के साथ 24 स्थानों के लिए हाल की अवधि (2011-16) के लिए सभी स्थानों पर एक जैसी होने वाली घटना, जलवायु परिवर्तन को परिभाषित करता हैं।
  • चावल में अदुथुराई (टीएन) में पित्त मिज, ब्लैकबग और पीले तने वाले बोरर पर पैरासिटॉइड टेट्रास्टीकस के लिए, मांड्या (केए) में कैसवर्म के लिए, लुधियाना (पीबी) में स्टेम बोरर्स के लिए और रायपुर में पैनिकल माइट और झूठी स्मूथ के लिए जलवायु परिवर्तनशीलता का क्षेत्र स्तर प्रभाव निकाला गया।
  • चावल में कीड़ों का सह-अस्तित्व काफी हद तक जगह निष्पक्ष है, यहां तक कि महत्वपूर्ण अंतर जलवायु परिवर्तनशीलता के साथ भी सभी स्थानों पर मौसम के बीच बदलते परिवेश में कीटों के अनुकूलन के संकेत देता है।
  • अरहर में कलबुर्गी (केए) में जसिड्स और फाइटोफ्थोरा, वंबन (टीएन) में फली ततैया, वारंगल (टीएस) में फ्यूसैरियम विल्ट और एस.के. नगर (जीजे) में स्टेरलिटी मोज़ेक का घटना का कारण वर्षा परिवर्तनशीलता से प्रभावित पाया गया।
  • तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से अधिकतम तापमान में वृद्धि और न्यूनतम तापमान में गिरावट/उतार-चढ़ाव को मूंगफली पर बढ़ी हुई थ्रिप्स, धारवाड़ (केए), जलगाँव (एमएच), कादिरी (एपी), वृद्धाचलम (टीएन), और जूनागढ़ (जीजे) कारण के रूप में पाया गाय।
  • कल्याणी (डब्लू.बी.) में टमाटर के लीफ़ स्पॉट के लिए मौसम आधारित एल्गोरिदम का विकास व सत्यापन किया गया।
  • रेप्रेजेंटटीव कंसंन्ट्रसन पाथवेज़ (आर.सी.पी.) का उपयोग कर सात स्थानों के लिए भविष्य के जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से चावल में नशीजीवों की स्थिति का अनुमान, कादिरी (एपी) में मूँगफली में जासिड और थ्रिप्स, वंबन (टीएन) मेंहेलिकोवर्पा आर्मिगेरे क्के लिए निकाला गया।
  • खरीफ में चावल (14), अरहर (11), मूंगफली (10) और टमाटर (15) सात, छह, पांच और सात स्थानों के लिए व रबी में मूंगफली (19) के कीटों और बीमारियों के लिए पूर्वानुमान मॉडल विकसित व सत्यापित किए गए।
  • आईसीएआर-एनसीआईपीएम में कीट पूर्वानुमानों पर डिजिटल टूल विकसित और होस्ट किए गए। आईसीएआर-कृषि पोर्टल और गूगल प्ले स्टोर पर कीट पूर्वानुमान हेतु मोबाइल एप्लिकेशन (Android आधारित) (1) पेस्ट्रिडिक्ट-आरबीएस (Vol.1); (2) पेस्ट्रिडिक्ट-आरबीएस (Vol.2) (तीन फसलें); (3) पेस्टप्रिडक्ट-ईएमएस (खरीफ) (चार फसलें); (4) कीट-प्रकोप-रबी (रबी) (मूंगफली–चार स्थानो के लिए) हेतु होस्ट है।
  • कीटनाशक और कवकनाशी कैल्कुलेटर (IFC), मोबाइल ऐप - 16 फसलों के लिए धान , कपास, अरहर, मूंगफली, टमाटर, सोयाबीन, चिकी, मिर्च, ओकरा, गोभी, फूलगोभी, (गन्ना + सरसों, + गेहूं), आलू, बैंगन हेतु कृशिपोर्टल और गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध है।

प्रमुख फसल कीटों की पहचान और उनके समेकित प्रबंधन

  • भरतपुर और हिसार में सरसों एफिड की पहली उपस्थिति पर ब्लॉक स्तर पर भविष्यवाणी मॉडल विकसित और सत्यापित किया गया जोकि वेद-भू पोर्टल के माध्यम से वेब-आधारित प्रणाली के साथ संचालित है।
  • कटक में धान के येल्लो स्टेम बोरर के लिए, भरतपुर में सरसों के एफिड्स व अबोहर- फाजिल्का और जालना में कपास के कॉटन लीफ कर्ल वायरस, जसिड्स और थ्रिप्स इन्फेक्शन के ले हाइपर स्पेक्ट्रल डेटा एकत्र किया गया।
मानव संसाधन विकास (एच.आर.डी. )
केवीके कर्मियों को प्रशिक्षण दिया गया
    वर्ष प्रशिक्षणों की संख्या
    2014 12
    2015 05
    2016 11
    2017 16
    2018 08
    2019 04
    2020 01
    Total 57
  • एक अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण
  • एक विंटर स्कूल
  • IPM प्रशिक्षण के लिए कवर किए गए KVK की संख्या - 514
training
शोध प्रकाशन
      शोध पत्र 110
      लोकप्रिय लेख 60
      तकनीकी बुलेटिन / मैनुअल 19
      एक्सटेंशन फ़ोल्डर 15
      पुस्तक अध्याय 25
      रेडियो वार्ता / टीवी प्रस्तुति 27
आईपीएम प्रौद्योगिकी का स्थानांतरण
      प्रदर्शनियों में भागीदारी 23
      एक्सपोजर का दौरा
     छात्र 1790
      शोधकर्ताओं 45
      एक्सटेंशन के कर्मचारी 240
      किसान 2050
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यह वेबसाइट एकीकृत कीट प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र से संबंधित है, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, विभाग के तहत एक स्वायत्त संगठन कृषि अनुसंधान और शिक्षा, कृषि और किसानों का मंत्रालय कल्याण, भारत सरकार।

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